अपोलो मंदिर के द्वार पर 'स्वयं को जानो' शब्द उत्कीर्ण है। एथेंस के विद्वान सुकरात को लोगों को अपने भीतर की प्रकृति को खोजने की प्रेरणा देना प्रिय लगता था। वहाँ की एक स्थानीय दन्तकथा इस प्रकार है कि एक बार सुकरात किसी मार्ग से जा रहा था। अपने गहन दार्शनिक चिन्तन में मगन सुकरात जब अचानक किसी से टकराया तब वह व्यक्ति क्रोध में बड़बड़ाया, “तुम देख नहीं सकते कि तुम कहाँ चल रहे हो, तुम कौन हो?" सुकरात परिहास करते हुए उत्तर देता है-“मेरे प्रिय मित्र, मैं गत चालीस वर्षों से इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ रहा हूँ। यदि तुम्हें इसका उत्तर ज्ञात है कि "मैं कौन हूँ, तो कृपया मुझे बताएँ।" वैदिक परम्परा में भी जब ईश्वरीय ज्ञान की शिक्षा दी जाती है तो प्रायः उसका प्रारम्भ आत्म-ज्ञान की शिक्षा से होता है। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में भी इसी दृष्टिकोण को प्रसारित किया है। उनका निम्न संक्षिप्त संदेश सुकरात के हृदय को भी छू लेता। श्रीकृष्ण अपने दिव्य उपदेश के प्रारम्भ में यह वर्णन कर रहे हैं कि जिस अस्तित्व को हम 'स्वयं' कहते हैं, वह आत्मा है न कि भौतिक शरीर और यह भगवान के समान नित्य है। 

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